सोमवार, अक्टूबर 3, 2022
Advertisement
होमIndia Newsशहीद चंद्रशेखर की शहादत पर बेटी को गर्व : बोली- 38 साल...

शहीद चंद्रशेखर की शहादत पर बेटी को गर्व : बोली- 38 साल से पिता का पार्थिव शरीर भी सियाचिन में निभा रहा ड्यूटी

नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच सियाचिन को लेकर हुई झड़प में शामिल रहे 19 कुमाऊं रेजीमेंट के लांसनायक चंद्रशेखर हर्बोला का पार्थिव शरीर 38 साल बाद सियाचिन में मिला है। इसकी सूचना सेना की ओर से उनके परिजनों को दी गई है। मूल रूप से अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट के हाथीगुर बिंता निवासी चंद्रशेखर हर्बोला 19 कुमाऊं रेजीमेंट में लांसनायक थे। वह 1975 में सेना में भर्ती हुए थे। 1984 में भारत और पाकिस्तान के बीच सियाचिन के लिए युद्ध लड़ा गया था। भारत ने इस मिशन का नाम ऑपरेशन मेघदूत रखा था।

यह भी पढ़ें :- 38 साल बाद भी बर्फ से सुरक्षित मिला पार्थिव शरीर, शहीद चंद्रशेखर की ऐसे हुई पहचान

चंद्रशेखर हर्बोला जिस समय उनके पिता शहीद हुए थे उस समय वह काफी छोटी थीं। शहीद लांसनायक चंद्रशेखर हर्बोला की छोटी बेटी बबीता की उम्र अब 42 साल है। उन्हें अब उन्हें इस बात का गर्व है कि वह उस व्यक्ति की बेटी हैं जिन्होंने देश के लिए अपनी जान न्यौछावर की है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके पिता का पार्थिव शरीर सियाचिन में अपनी ड्यूटी आज भी निभा रहा। बबीता ने बताया कि उनकी माता ने उनको बताया था कि वह अपने पिता की गोद में बहुत खेला करती थीं। उनके पिता उन्हें कंधे पर बैठाकर गांव में घूमते थे। जब भी पिता छुट्टी में घर आते थे तो दोनों ही बेटियां अपने पिता से चिपक जाती थीं।

कुछ दिनों तक तो वह अपनी मां के पास भी नहीं आती थीं। उनके पिता अपनी बेटियों के लिए खिलौने और खाने का सामान लेकर आते थे। बबिता ने बताया कि उन्होंने कभी भी नहीं सोचा था कि वह अपने पिता को बहुत ही कम उम्र में खो देंगी। उन्होंने बताया कि जब बड़ी हुईं और चीजों को समझने लगीं तब उन्हें पता चला कि उनके पिता देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए हैं। वह भी उस सियाचिन में जहां पर एक आम आदमी का पांच मिनट रहना भी जानलेवा साबित हो जाता है। उन्होंने बताया कि वर्दी में कोई भी शख्स उन्हें जब भी दिखता है तो उसके लिए उन्हें एक अपनापन लगता है।

ऐसा लगता है कि जैसे उस वर्दी के शख्स में उनको अपने पिता की छवि नजर आती है। उन्होंने भावुक होते बताया कि वह कभी भी ‘ए मेरे वतन के लोगों जरा याद करो कुर्बानी’ गीत नहीं सुनती हैं। अगर वह ऐसी जगह पर होती हैं जहां पर ये गीत सुना जा रहा है तो वह वहां से हट जाती हैं या फिर लोगों से उस गीत को बंद करने की गुजारिश करती हैं क्योंकि इस गीत को सुनते ही तुरंत रोने लगती हैं। उन्हें अपने पिता की याद आती है। साथ ही जब भी अखबार में या टीवी पर किसी सैनिक के शहीद होने की खबर देखती हैं तो उन्हें अपने पिता की तुरंत याद आती है। वह टीवी बंद कर देती हैं और अखबार को कभी भी पूरा नहीं पढ़ती हैं।

उन्होंने कहा कि मैं कभी भी फेसबुक या व्हाट्सएप पर आने वाले शहीदों से जुड़े वीडियो को भी नहीं देख पाती हूं। कहा कि आज जब उनके पिता का पार्थिव शरीर आ रहा है तो वह शब्दों में बता ही नहीं सकती हैं कि उनके जहन में क्या भावनाएं उमड़ रही हैं। कहा कि भावनाओं का एक अजीब सा संगम हो रहा है।

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

Most Popular

Recent Comments