रविवार, नवम्बर 27, 2022
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Kargil Vijay Diwas 2022: टाइ‍गर हिल, बटालिक… करगिल की वो लड़ाइयां, जिनमें पाकिस्तानी घुसपैठियों के छक्‍के छूट गए

नई दिल्ली। आज यानी 26 जुलाई को देशभर में कारगिल विजय दिवस (Kargil Vijay Diwas 2022) मनाया जा रहा है। आज के ही दिन वर्ष 1999 में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ दिया और ‘ऑपरेशन विजय’ के हिस्से के रूप में टाइगर हिल और अन्य चौकियों पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना के वीरों ने 1999 करगिल युद्ध में 12,000 फीट से ज्‍यादा ऊंचाई पर लड़ते हुए पाकिस्‍तानी घुसपैठियों को कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया था। हमारे जांबाज भूख प्यास की परवाह किए बिना सिर पर कफन बांधकर आगे बढ़ते रहे। कई शहीद हुए, कई जख्मी हुए, लेकिन अपने अटल इरादे से पीछे नहीं हटे। आखिरकार 26 जुलाई 1999 को करगिल पर वापस हिंदुस्तान की फौज ने तिरंगा लहराया। अब उस जीत के 23 साल पूरे हो गए हैं। कारगिल विजय दिवस पर भारत के नेता शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि दी

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कारगिल विजय दिवस पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित कीं। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि कारगिल विजय दिवस हमारे सशस्त्र बलों की असाधारण वीरता, पराक्रम और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। भारत माता की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले सभी वीर सैनिकों को मैं नमन करती हूं। सभी देशवासी, उनके और उनके परिवारजनों के प्रति सदैव ऋणी रहेंगे। जय हिन्द!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कारगिल विजय दिवस पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित कीं। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि कारगिल विजय दिवस मां भारती की आन-बान और शान का प्रतीक है। इस अवसर पर मातृभूमि की रक्षा में पराक्रम की पराकाष्ठा करने वाले देश के सभी साहसी सपूतों को मेरा शत-शत नमन। जय हिंद! इधर, दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर 1999 के कारगिल युद्ध में अपनी जान गंवाने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। वहीं तीनों सेना प्रमुखों – थल सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे, नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार और वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने कारगिल विजय दिवस पर दिल्ली में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की।

तोलोलिंग की लड़ाई : भारतीय सेना की पहली बड़ी जीत

घुसपैठियों की भनक लगने के बाद सेना ने मई 1999 में करगिल के तोलोलिंग में ऑलआउट अटैक लॉन्‍च किया। 6 जून 1999 को पॉइंट 4590 पर तिरंगा लहरा रहा था। वीर रणबांकुरों ने 12 जून 1999 को तोलोलिंग की चोटी पर भी कदम जमा लिए।

टाइगर हिल की लड़ाई: पाकिस्‍तानी सैनिकों को खदेड़ना बेहद चुनौतीपूर्ण

द्रास-करगिल सेक्‍टर की सबसे ऊंची चोटियों में से एक थी- टाइगर हिल। यहां से पाकिस्‍तानी सैनिकों को खदेड़ना बेहद चुनौतीपूर्ण था। पूरे संघर्ष का सबसे मुश्किल मिशन। सेना ने 4 जुलाई 1999 को टाइगर हिल पर तिरंगा लहराया।

खालूबार की लड़ाई: जहां लिखी गईं बहादुरी की गाथाएं

अपनी लोकेशन के चलते खालूबार रिज बेहद अहम फीचर थी। यहां से लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पर सीधा निशाना मिलता है। हर तरफ नुकीले पत्‍थर और सीधी चढ़ाई… करगिल युद्ध के कई महावीरों ने खालूबार की लड़ाई में प्राणों की आहुति दे दी। इसके बावजूद सेना ने ना सिर्फ दुश्‍मन को मुंहतोड़ जवाब दिया, कम्‍युनिकेशन और सप्‍लाई लाइंस ध्‍वस्‍त करके उसकी कमर तोड़ दी।

बटालिक: जहां मिली ऑपरेशन विजय की पहली सफलता

ऑपरेशन विजय की पहली सफलता 9 जून 1999 को बटालिक सेक्‍टर के रॉकफॉल इलाके में मिली। इसके बाद पॉइंट 4875, गढ़ी, पॉइंट 5000 और जुबार कॉम्‍प्‍लेक्‍स पर सिलसिलेवार हमले शुरू किए गए थे। बटालिक सेक्‍टर को 7 जुलाई, 1999 तक पूरी तरह दुश्‍मनों से खाली करा लिया गया था।

ककसार की लड़ाइयां…

यही वह इलाका था जहां सर्दियों में खाली छोड़ी गईं पोस्‍ट्स पर वापस जाते समय भारत की पैट्रोल टुकड़ी पर हमला हुआ था। करगिल युद्ध की सबसे भीषण लड़ाइयां यहीं पर हुईं। भारतीय सेना ने कई राउंड के हमलों के बाद पाकिस्‍तानियों को खदेड़ दिया।

पॉइंट 4875 की लड़ाई और कैप्‍टन विक्रम बत्रा

मश्कोह घाटी की पॉइंट 4875 चोटी रणनीतिक लिहाज से बेहद अहम थी। भारतीय सेना ने 7 जुलाई 1999 को इस चोटी को कब्ज़े में लेने के लिए अभियान शुरू किया। जिम्‍मेदार पॉइंट 5410 फतह करने वााले भी कैप्टन विक्रम और उनकी टुकड़ी को सौंपी गई। इस अभियान को पूरा करने के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा एक संर्कीण पठार के पास से दुश्‍मन ठिकानों पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। युद्ध के दौरान आमने-सामने की भीषण लड़ाई में कैप्टन विक्रम बत्रा ने पांच दुश्मन सैनिकों को पॉइंट ब्लैक रेंज में मार गिराया। इस दौरान वे दुश्मन स्‍नाइपर के निशाने पर आ गए और गंभीर रूप से जख्मी हो गए। उन्होंने जान की परवाह भी नहीं की और इस अभियान को दुश्मनों की भारी गोलीबारी में भी पूरा किया, लेकिन बुरी तरह घायल होने के कारण कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद हो गए।

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