सोमवार, अक्टूबर 3, 2022
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चीनी जहाज युआन वांग-5 की श्रीलंका में एंट्री : भारत की चिंता के ये हो सकते हैं कारण

नई दिल्ली। भारत और अमेरिका की चिंताओं के बीच चीनी स्पाई शिप युआन वांग-5 मंगलवार सुबह का श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर पहुंच गया है। यह स्पाई शिप 16 से 22 अगस्त तक यहां रहेगा। यह करीब 750 किमी दूर तक आसानी से निगरानी कर सकता है। चीनी जासूसी शिप युआन वांग-5, 13 जुलाई को जियानगिन पोर्ट से रवाना हुआ था। हंबनटोटा पोर्ट के लिए चीन ने श्रीलंका को 1.5 अरब डॉलर का कर्ज दिया था। इसे नहीं चुकाने पर चीन ने इस पोर्ट को श्रीलंका से 99 साल की लीज पर ले लिया। युआंग वांग 5 नाम के इस जहाज को लेकर चर्चाओं का लंबा दौर चला। खबरें थी कि श्रीलंका ने बंदरगाह पर लाने की अनुमति नहीं दी है, लेकिन बाद में चीन को इजाजत मिली और यह हम्बनटोटा पहुंच गया। लेकिन सवाल उठता है कि इन गतिविधियों से भारत क्यों चिंतित है? आईए संभावित कारणों को समझते हैं।

श्रीलंका की लचर विदेश नीति से भारत की सुरक्षा को खतरा

श्रीलंका की लचर विदेश नीति ही भारत को सुरक्षा के दृष्टिकोण से खतरे में डाल रही है। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि कहने को तो हंबनटोटा बंदरगाह सिर्फ व्यावसायिक गतिविधियों के लिए ही चीन ने अरबों डालर का निवेश कर लीज पर लिया है। जब चीन ने हंबनटोटा में निवेश कर इसको लिया था उस वक्त भी अमेरिका समेत दुनिया की तमाम देशों की सुरक्षा एजेंसियों ने इस पर सवाल उठाए थे। कहा जा रहा था कि चीन इस बंदरगाह को सैन्य बंदरगाह के तौर पर डेवलप कर सकता है।

समुद्र में गतिविधियां

खबर है कि चीन का यह जहाज समुद्र में सर्वे भी कर सकता है, जिसके चलते उसे हिंद महासागर में सबमरीन से जुड़े ऑपरेशन में मदद मिले। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2021 में चीनी सरकार का सर्वे शिप भी इसी क्षेत्र में काम कर रहा था और वह सुमात्रा के पश्चिम में एक खास खोजी पैटर्न को अंजाम दे रहा था।

अब तक का सफर

अब एक वजह इसकी अवधि हो सकती है। दरअसल, यह जहाज 22 अगस्त तक बंदरगाह पर आपूर्तियां से जुड़े कामों के चलते रहेगा। अब खास बात है कि 14 जुलाई को चीन से रवाना होने के बाद यह किसी भी बंदरगाह पर नहीं रुका और हम्बनटोटा पहुंचा।

सैटेलाइट ट्रैकिंग में महारथी है चीनी जहाज

चीनी जासूसी शिप युआन वांग 5 को 2007 में बनाया गया था। यह मिलिट्री नहीं बल्कि पावरफुल ट्रैकिंग शिप है। युआन वांग-5 को स्पेस और सैटेलाइट ट्रैकिंग में महारत हासिल है। युआंग वांग 5 इस तरह के सैंसर मौजूद हैं, जो भारत की बैलिस्टिक मिसाइलों को ट्रैक कर सकते हैं। भारत की तरफ से मिसाइल्स की टेस्टिंग ओडिशा तट के पास अब्दुल कलाम द्वीप पर किया जाता है।

पुरानी हैं चिंताएं

साल 2014 में भी चीन की एक न्यूक्लियर पावर्ड सबमरीन श्रीलंका के एक बंदरगाह पर पहुंची थी। खास बात है कि उस दौरान इसके चलते भारत और श्रीलंका के रिश्तों में भी खटास आ गई थी। उस दौरान श्रीलंका ने कहा था कि जहाज को अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद नहीं करेगी और इसे साइंटिफिक रिसर्च की भी अनुमति नहीं होगी। श्रीलंका की पोर्ट अथॉरिटी ने यह भी कहा था कि हम्बनटोटा बंदरगाह का काम चीनी कंपनी देखती है, लेकिन संचालन संबंधी मुद्दों को अथॉरिटी ही संभालती है।

देशों के रिश्ते

विकास कार्य के लिए गए कर्ज को नहीं लौटाने में असफल होने के बाद हम्बनटोटा को 99 साल के लिए चीन को लीज पर दे दिया गया था। अब भारत के लिए भी चिंता का मुद्दा यह बंदरगाह ही है। लीज पर दिए जाने के बाद इसके सैन्य इस्तेमाल को लेकर भी चिंताएं बढ़ीं। अब अगर आपसी रिश्तों को देखें तो भारत और श्रीलंका के मुख्य लेनदार चीन के बीच सीमा पर तनाव बना हुआ है। वहीं, मुश्किल हालात से गुजर रहे श्रीलंका को भारत लगातार मदद पहुंचा रहा है।

भारत इसको लेकर अलर्ट

जासूसी के खतरे को देखते हुए भारत ने इसे लेकर श्रीलंका के सामने विरोध दर्ज कराया था। दरअसल, हंबनटोटा पोर्ट से तमिलनाडु के कन्याकुमारी की दूरी करीब 451 किलोमीटर है। इसके बावजूद श्रीलंका ने इसे हंबनटोटा पोर्ट पर आने की अनुमति दी। अब भारत इसको लेकर अलर्ट पर है। इंडियन नेवी की शिप के मूवमेंट पर कड़ी नजर है।

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