शुक्रवार, अगस्त 19, 2022
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किन्नर गुरु को मानते हैं अपना पति क्यों? एक दिन बाद हो जाती है विधवा, खड़ा करके दफनाते हैं शव!

नई दिल्ली। हमारे समाज का ताना-बाना मर्द और औरत से मिलकर बना है, लेकिन एक तीसरा जेंडर (लिंग) भी इसी समाज का हिस्सा है, जिसे सभ्य समाज हिकारत भरी नजरों से देखता है। जिसे आम भाषा में किन्नर कहते है। यूं तो किन्नर भी आम बच्चों की तरह ही इस दुनिया में आते हैं, लेकिन बीतते वक्त के साथ शारीरिक बदलाव उन्हें हम सब से अलग बनाते हैं। ज्यादातर किन्नर शादी हो या फिर बच्चे का जन्म के आगमन पर बधाई गाते। आशीर्वाद देने के लिए आखिर कहां से आ जाते है? आखिर कौन हैं ये लोग? क्यों इनका जन्म एक कहानी और अंतिम विदाई एक पहेली है? आइए जानते है।

घर से शुरू हो जाती है जुल्म-ओ-सितम की कहानी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार और किन्नर समुदाय पर करीब ढाई दशक से शोध कर रहे महेंद्र भीष्म बताते हैं कि जब घर में किन्नर बच्चा पैदा होता है तो मां-बाप भी मुंह मोड़ लेते हैं। बच्चे से मारपीट करते हैं। इज्जत पर आंच न आए, इसलिए बच्चे को किन्नर समुदाय को सौंप देते हैं। वहीं कुछ माता-पिता अपने बच्चे को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाना चाहते हैं, लेकिन समाज बच्चे को इतना मजबूर कर देता है कि वह 15-16 साल की उम्र में तंग आकर खुद ही घर छोड़ देता है।

जेएनयू की शोध छात्रा हर्षिता द्विवेदी देश भर में रह रहे किन्नरों से मिलती हैं। उनके साथ बैठती हैं, समय गुजारती हैं। ताकि वे हंसते गाते चेहरों के पीछे का गहरे बादल से भी स्याह दर्द महसूस कर सकें। वे लोग, जिनके प्रजनन अंग पूरी तरह विकसित न हुए हों। पुरुष शरीर, लेकिन स्त्रियों सी छाती, चाल-ढाल और आवाज। स्त्री शरीर, लेकिन मूंछ आना, छाती न बढ़ना, गर्भाशय न होना आदि। जन्मजात किन्नर मन से स्त्री होते हैं। वे महिलाओं के साथ रहने में सहज महसूस करते हैं। उन्हें औरतों की तरह सजना संवरना रास आता है।

किन्नरों की होती हैं चार शाखाएं…

किन्नरों की चार शाखाएं होती हैं- बुचरा, नीलिमा, मनसा और हंसा। बुचरा जन्मजात किन्नर होते हैं। नीलिमा स्वयं बने, मनसा स्वेच्छा से शामिल होते हैं। वहीं हंसा शारीरिक कमी या नपुंसकता के कारण बने हिजड़े हैं।

सात घराने, हजारों गद्दियां

हर्षिता बताती हैं कि अब तक मैं हजारों किन्नरों से मिल चुकी हूं। दर्द की जुबानी लाखों कहानियां सुन चुकी हूं। किन्नर समुदाय में गुरु शिष्य परंपरा सबसे ऊपर होती है। देश भर में किन्नरों के साथ सात घराने हैं। हजारों गद्दियां (एक क्षेत्र, जहां रहने वाले किन्नरों का एक प्रमुख होता है) हैं, जिनसे लाखों किन्नर जुड़े हैं।

घराने में शामिल होने पर होता है जश्न

हर्षिता बताती है कि जब भी किसी घराने में नया किन्नर आता है तो उत्सव मनाया जाता है। दूसरे घरानों के गुरु और गद्दियों के प्रमुख आते हैं। खूब नाच गाना होता है। गुरु घराने में शामिल होने वाले किन्नर को नया नाम देते हैं। कपड़े, पैसे, गहने और गृहस्थी का कुछ सामान देते हैं। उसके बाद से किन्नर के लिए माता-पिता, पति और भाई-बहन और परिवार का मुखिया सब कुछ गुरु ही बन जाता है। किन्नर गुरु के नाम का सिंदूर लगाते हैं। करवाचैथ का व्रत भी रखते हैं। गुरु का परिवार के मुखिया की तरह सम्मान करते हैं।

घरानों में दी जाती है तालीम

दीक्षा मिलने के बाद घराने में किन्नरों की भाषा, नाच-गाना ताली और ढोलक बजाने की तालीम दी जाती है। फिर अनुभवी किन्नरों के साथ क्षेत्र में बधाई गाने भेज दिया जाता है। किन्नरों की जो कमाई होती है, उसमें से एक हिस्सा गद्दी या घराने को देना होता है।

कौन बनता है किन्नरों का गुरु?

हर्षिता के मुताबिक, घराने का गुरु पांच लोगों को वरीयता के आधार पर अपना उत्तराधिकारी घोषित करता है। गुरु के निधन के बाद इन पांच में से जो सबसे वरिष्ठ होता है, वह घराने का गुरु बनता है। किन्नर समुदाय के लिए गुरु की बात पत्थर की लकीर होती है।

हिजड़ों के भी हैं कुछ नियम

एक घराने ने अपने यहां निकाल दिया तो दूसरा घराना अपने यहां नहीं रख सकता है। अगर किसी दूसरे घराने का हिजड़ा पसंद आ जाए तो गुरु उसकी मुंह मांगी कीमत चुका कर ही अपने घराने में ला सकता है, बहला-फुसलाकर नहीं। किन्नर समाज की सारी गोपनीयता को गोपनीय रखने की शपथ भी निभानी होती है।

बहनापा अजीबोगरीब है रिवाज

महेंद्र भीष्म के मुताबिक, जब एक किन्नर दूसरी किन्नर से बहन का रिश्ता जोड़ती है तो दोनों एक-दूसरे को स्तनपान कराती हैं। इसका उम्र से कोई लेना-देना नहीं है। इस रिवाज को किन्नरों की भाषा में बहनापा कहा जाता है।

एक रात के लिए करते हैं शादी

महेंद्र भीष्म बताते हैं कि वोऐसे कई किन्नरों से मिल चुके हैं, जिन्हें सामान्य पुरुषों से प्यार हो गया। लेकिन एक-दो को छोड़कर ज्यादातर को प्यार में धोखा ही मिला है।
हर्षिता द्विवेदी बताती हैं, किन्नर अपनी धार्मिक मान्यता के मुताबिक हर साल शादी करते हैं। तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में कुनागम गांव है, जहां तमिल नववर्ष की पहली पूर्णिमा से 18 दिन का किन्नर विवाहोत्सव शुरू होता है। यहां देशभर से हजारों किन्नर जुटते हैं। उत्सव के 17वें दिन किन्नर अपने आराध्य देव अरावन की मूर्ति संग ब्याह रचाते हैं। यह शादी सिर्फ एक रात के लिए होती है।

अगले दिन हो जाते है विधवा

इसके अगले दिन यानी 18वें दिन अरावन देव का एक विशाल पुतला पूरे शहर में गाजे-बाजे के साथ घुमाया जाता है। अंत में पुतले का अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। उसके बाद तमाम किन्नर विधवा होने का स्वांग रचते हैं। अपनी चूड़ियां तोड़ते हैं। सिंदूर मिटाते हैं और शोक मनाते हैं। इस परंपरा को साउथ और वेस्ट इंडिया वाले किन्नर बेहद गंभीरता से निभाते हैं।

अंतिम विदाई है पहेली

किन्नरों का अंतिम संस्कार अब भी एक पहेली बना हुआ है। इनके अंतिम संस्कार को लेकर तरह-तरह की धारणाएं बनी हुई हैं। हर्षिता के मुताबिक, किन्नर का मरने के बाद दाह संस्कार नहीं किया जाता है, बल्कि दफनाया जाता है। दफनाते वक्त लिटाया नहीं जाता है, कब्र में खड़ा किया जाता है। दफनाने से पहले गुरु की ओर से चयनित पांच लोग अपनी आपबीती सुनाते हैं और मृतक की आत्मा को मुक्ति मिले, इसकी प्रार्थना करते हैं। उसके बाद दफनाते हैं। अंतिम संस्कार होते हुए किसी ने देखा क्यों नहीं? इसके जवाब में हर्षिता कहती हैं कि दिल्ली के महरौली, गाजियाबाद समेत देश भर में किन्नरों के गिने-चुने शमशान घाट हैं। ज्यादातर जगहों पर इनके लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में किन्नर जहां रहते हैं, उसके आसपास ही शव को दफना देते हैं। लेकिन अब मकान पक्के हैं तो किन्नरों के करीबी या फिर मुंहबोले चाचा, काका, भाई सूर्यास्त के बाद शव को शमशान में ले जाकर दफना देते हैं। शव यात्रा में बहुत कम लोग होते हैं, यहां तक कि सारे किन्नर भी शामिल नहीं होते हैं। चप्पल-जूते मारने, पीटते हुए श्मशान ले जाने और गालियां देने वाली बातों में सच्चाई न के बराबर है।

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